YCMOU B.A Second year HIN 213 solved Assignments 2022
HIN 213 - हिंदी: कथनपर साहित्य
🔹पत्र साहित्य के तत्त्व स्पष्ट कीजिए ।
🔹रिपोर्ताज के स्वरुप, परिभाषा एंव विशेषताए लिखिए।
🔹यात्रा वर्णन के तत्त्व स्पष्ट कीजिए् ।
🔹निबंध के प्रकार स्पष्ट कीजिए ।
🔹पत्र साहित्य के तत्त्व स्पष्ट कीजिए ।
Answer:
कलात्मक पत्र एक साहित्यिक विधा है। इसके द्वारा लेखक की भिन्न-भिन्न साहित्यिक तथा सांसारिक भाव दशाओं का बोध होता है। साथ ही उसकी (लेखक की) रुचियों-अरुचियों, सामाजिक और वैयक्तिक सम्बन्धों आदि का आश्चर्यजनक परिज्ञान होता है। पत्र में संक्षिप्तता और एकतथ्यता होती है। इस कारण ये स्वयंपूर्ण होते हैं। साहित्य की इस विधा (पत्र) के माध्यम से कलाकार के निजी रहस्यों का उद्घाटन होता है।
पत्र साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है–
1. व्यक्तिगत पत्रों के स्वतंत्र संकलन,
2. विविध विषयक ग्रंथों में परिशिष्ट आदि के अन्तर्गत संकलित पत्र,
3. पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित पत्र।
पत्र लिखने के लिए कुछ आवश्यक बातें
(1) जिसके लिए पत्र लिखा जाये, उसके लिए पद के अनुसार शिष्टाचारपूर्ण शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। (2) पत्र में हृदय के भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त होने चाहिए। (3) पत्र की भाषा सरल एवं शिष्ट होनी चाहिए। (4) पत्र में बेकार की बातें नहीं लिखनी चाहिए।
🔹रिपोर्ताज के स्वरुप, परिभाषा एंव विशेषताए लिखिए।
Answer:
यह गद्य में लेखन की एक विशिष्ट शैली है। रिपोर्ताज से आशय इस तरह की रचनाओं से है जो पाठकों को किसी स्थान, समारोह, प्रतियोगिता, आयोजन अथवा किसी विशेष अवसर का सजीव अनुभव कराती हैं। गद्य में पद्य की सी तरलता और प्रवाह रिपोर्ताज की विशेषता है। अच्छा रिपोर्ताज वह है जो पाठक को विषय की जानकारी भी दे और उसे पढ़ने का आनन्द भी प्रदान करे। रिपोर्ताज की एक बड़ी विशेषता इसकी जीवन्तता होती है। गतिमान रिपोर्ताज पाठक को बाॅंध लेता है। पाठक उसके प्रवाह में बंध कर खुद ब खुद विषय से जुड़ जाता है। इसलिए रिपोर्ताज लेखन में इस बात का खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसमें दोहराव न हो और जानकारियों का सिलसिला बना रहे। रिपोर्ताज लेखक को विषय-वस्तु की बारीक जानकारी होनी चाहिए। विषय से जुड़ी छोटी-छोटी जानकारियाॅं ही रिपोर्ताज को रोचक बनाती है।
रिपोर्ताज reportage की भाषा शैली में कथा-कहानी जैसा प्रवाह और सरलता होनी चाहिए। रिपोर्ताज मूलतः फ्रांसीसी भाषा का शब्द है जो अंग्रेजी के रिपोर्ट शब्द से विकसित हुआ है। रिपोर्ट का अर्थ होता है किसी घटना का यथातथ्य वर्णन। रिपोर्ताज इसी वर्णन का कलात्मक तथा साहित्यिक रूप है। रिपोर्ताज घटना प्रधान होते हुए भी कथा तत्व से परिपूर्ण होता है। एक तरह से रिपोर्ताज लेखक को पत्रकार और साहित्यकार, दोनों की भूमिकाएं निभानी होती हैं।
रिपोर्ताज का अर्थ
रिपोर्ताज मूलत: फ्रेंच (फ्रांसीसी) भाषा का शब्द है। इसका अंग्रेजी पर्याय रिपोर्ट माना जाता है। रिपोर्ताज का अभिप्राय किसी घटना, खबर, आंखो देखा हाल का यथा तथ्य वर्णन है जिसमें संपूर्ण विवरण दृश्यमान हो जाता है। जबकि वास्तविक घटना का यथातथ्य चित्र उपस्थित करना रिपोर्ट कहलाता है। हिंदुस्तानी में इसे रपट कहते हैं। इसका सीधा संबंध समाचार पत्र से होता है इसलिए तथ्य चयन पर विशेष महत्व दिया जाता है। किसी विषय का आंखों देखा या कानों सुना वर्णन इतने कलात्मक, साहित्यिक और प्रभावोत्पादक ढंग से किया जाता है कि उसकी अमिट छाप हृदय पटल पर अंकित हो जाती है उसे रिपोर्ताज की संज्ञा दी जाती है।
रिपोर्ताज लेखक की वैयक्तिकता के साथ-साथ इसमें भावना एवं संवेदना का आवेश भी समन्वित होता है। लेखक घटना विशेष को लेखक अपनी मानसिकता से प्रदीप्त करके पुन: मूर्त रूप में इसका प्रस्तुतीकरण रिपोर्ताज का स्वाभाविक धर्म है। रिपोर्ट की साहित्यिकता उसे रिपोर्ताज का स्वरूप प्रदान करती है।
रिपोर्ताज को अन्य अनेक नाम दिए गए हैं जिनमें रूपनिका, सूचनिका तथा वृत निदेशन आदि प्रमुख हैं किंतु प्रचलित एवं सर्वमान्य शब्द रिपोर्ताज है।
रिपोर्ताज की परिभाषा
महादेवी वर्मा का कहना है - “रिपोर्ट या विवरण से संबंध रिपोर्ताज समाचार युग की देन है और उसका जन्म सैनिक की खाईयों में हुआ है।” रिपोर्ताज का विकास रूस में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के समय इलिया एहरेन वर्ग को रिपोर्ताज - लेखक के रूप में विशेष प्रसिद्धि मिली।
डॉ. भगीरथ मिश्र ने रिपोर्ताज को परिभाषित करते हुए लिखा है - “किसी घटना या दृश्य का अत्यंत विवरणपूर्ण सूक्ष्म, रोचक वर्णन इसमें इस प्रकार किया जाता है कि वह हमारी आंखों के सामने प्रत्यक्ष हो जाए और हम उससे प्रभावित हो उठें।”
कोई भी निबंध, कहानी, रेखाचित्र या संस्मरण पत्रकारिता से संपृक्त होकर रिपोर्ताज का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। साहित्यिकता इसका अनिवार्य तत्व है। रेखांकित एवं रिपोर्ट का समन्वित रूप रिपोर्ताज को जन्म देता है क्योंकि रेखाचित्र साहित्यिक विधा है।
रिपोर्ताज का विवेचन करेते हुए शिवदान सिंह चौहान ने लिखा है - “आधुनिक जीवन की द्रुतगामी वास्तविकता में हस्तक्षेप करने के लिए मनुष्य को नई साहित्यिक रूप विधा को जनम देना पड़ा। रिपोर्ताज उन सबसे प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण विधा है।”
🔹यात्रा वर्णन के तत्त्व स्पष्ट कीजिए् ।
Answer:
लेखक अपने यात्रा वर्णन में अमुक स्थान की प्राकृतिक विशिष्ठता, सामाजिक संरचना, समाज, लोगों के रहन सहन संस्कृति, स्थानीय भाषा, आगंतुकों के प्रति उनकी सोच व विचारों को अपने साहित्य में स्थान देता हैं. एक सच्चे यात्री के सम्बन्ध में कहा गया हैं कि उस यायावर की कोई मंजिल नहीं होती हैं.
वह मन की तरंगों के कथनानुसार आगे बढ़ता जाता हैं तथा राह की कठिनाइयों में आनन्द की अनुभूति को खोजता हैं. हिंदी के विद्वान् यायावर लेखक राकेश मोहन यात्रा के सम्बन्ध में कहते हैं कि यात्रा व्यक्ति को तटस्थ नजरियाँ देती हैं. जो हमें दैनिक जीवन में देखने को नहीं मिलती हैं. एक नयें वातावरण में जाकर व्यक्ति कुंठा मुक्त हो जाता हैं अपने निकट वातावरण के दवाब से मुक्त होकर, नयें स्थानों, नयें लोगों से सम्बन्ध स्थापित करता हैं.
यात्रावृत लेखन की दिशा में भी भारतेंदु युग के अनेक लेखकों ने योग दिया. भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने यात्रावृत विषयक अनेक रचनाएं रखी, जो कविवचनसुधा के अंकों में प्रकाशित हुई. इनमें सरयू पार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा और हरिद्वार की यात्रा उल्लेखनीय हैं.
इन यात्रा वृतांतों की भाषा व्यंग्य पूर्ण हैं और शैली बड़ी रोचक और सजीव हैं. बालकृष्ण भट्ट ने गया यात्रा और प्रताप नारायण मिश्र ने विलायत यात्रा नामक रचनाएँ लिखी. श्रीमती हरदेवी ने बम्बई से लंदन तक की जहाजी यात्रा का विस्तृत विवरण दिया हैं. भगवानदास वर्मा ने तुलनात्मक शैली का आश्रय लेते हुए लखनऊ और लन्दन की समानताएं प्रकट की हैं.
भारतेंदु युग में विदेश यात्रा सम्बंधी वर्णनों में लन्दन को प्रमुखता मिली है तो स्वदेश यात्रा सम्बन्धी वर्णनों में तीर्थ स्थानों को. यात्रा वृतांत हिंदी साहित्य के हर युग में लिखे गये. द्वेदी युग में भी लिखे गये. स्वामी मंगलानन्द ने मारीशस यात्रा और श्रीधर पाठक ने देहरादून शिमला यात्रा, उमा नेहरु ने युद्ध क्षेत्र की सैर और लोचनप्रसाद पाण्डेय हमारी यात्रा नामक यात्रा वृतांत लिखे.
इस युग के अन्य साहित्यकारों में देवीप्रसाद खत्री, गोपालराम, गहमरी, गदाधर सिंह, स्वामी सत्यदेव प्रिवार्जक आदि कवियों की रचनाएं भी महत्वपूर्ण हैं, पारिवार्जक द्वारा 1915 में रचित मेरी कैलाश यात्रा तथा 1911 की अमेरिका दर्शन को सुंदर ढंग से लिखा गया था.
यात्रा साहित्य के महत्व को प्रदर्शित करने वाली सत्यदेव की रचना यात्रा मित्र वर्ष 1936 में प्रकाशित हुई थी. इस पुस्तक के कैलास यात्रा के भाग में लेखक ने काठगोदाम से तिब्बत तक की यात्रा का सर्वाधिक विस्तृत विवरण दिया हैं. साथ ही कैलाश व हिमालय के अद्वितीय सौन्दर्य का चित्रण अपनी पुस्तक में प्रभावी ढंग से किया हैं.
🔹निबंध के प्रकार स्पष्ट कीजिए ।
Answer:
निबंध के प्रकार
निबंध के प्रकार के हैं-
वर्णनात्मक निबंध
विवरणात्मक निबंध
भावात्मक निबंध
साहित्यिक या आलोनात्मक निबंध
1. वर्णनात्मक निबंध
इन निबन्धों में निरूपण अथवा व्याख्या की प्रधानता रहती है। विभिन्न प्रकार के दृश्यों, घटनाओं तथा स्थलों का आकर्षक वर्णन करना ही इन निबन्धों का कलेवर - विषयवस्तु होता है। इन निबन्धों की अन्य विशेषता यह है कि- यहाँ प्राय: प्रत्येक निबंधकार अपने निबंध में एक सजीव-चित्र उपस्थित करता है। तीर्थ, यात्रा, नगर, दृश्य-वर्णन, पर्व-त्यौहार, मेले-तमाशे, दर्शनीय-स्थल आदि का मनोरम एवं संश्लिष्ट वर्णन करना ही निबंधकार का प्रमुख उद्देश्य होता है। इनमें लेखक प्रकृति और मानव-जगत् में से किसी से भी विषय चयन कर सर्वसाधारण के लिए निबंध-रचना करता है।
2. विवरणात्मक निबंध
विवरणात्मक-निबन्धों में कल्पना एवं अनुभव की प्रधानता होती है। साथ ही इस वर्ग के निबन्धों में वर्णन के साथ-साथ विवरण की प्रवृत्ति भी विद्यमान रहती है। इन्हें कथात्मक अथवा आख्यानात्मक निबंध भी कहा जाता है। विवरणात्मक-निबन्धों की विषयवस्तु मुख्यत: जीवनी, कथाएँ, घटनाएँ, पुरातत्त्व, इतिहास, अन्वेषण, आखेट, युद्ध आदि विषयों पर आधृत होती है। ये निबंध ‘व्यास-शैली’ में लिखे जाते हैं।
3. भावात्मक निबंध
भावात्मक-निबन्धों में बुद्धि की अपेक्षा रागवृत्ति की प्रधानता रहती है। इनका सीधा सम्बन्ध ‘हृदय’ से होता है। अनुभूति, मनोवेग अथवा भावों की अतिशय अभिव्यंजना इन निबन्धों में द्रष्टव्य है। इन निबन्धों में निबंधकार सहृदयता, ममता, प्रेम, करुणा, दया आदि भावनाओं से युक्त व्यवहार को प्रकट करता है।
4. साहित्यिक या आलोनात्मक निबंध
किसी साहित्यकार, साहित्यिक विधा या साहित्यिक प्रवृत्ति पर लिखा गया निबंध साहित्यिक या आलोचनात्मक निबंध कहलाता है, जैसे मुंशी प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिन्दी कविता, छायावाद हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग आदि। इसमें ललित निबंध भी आते हैं। इनकी भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है। ऐसे निबंध शोध पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।
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